Monday, October 15, 2018

मोदी को किन-किन रंगों से परहेज़

लेकिन ये मौजूदा समय में हो रहा है. वैसे इसकी एक वजह ये भी हो सकती है कि नरेंद्र मोदी काले कपड़ों से भी परहेज़ करते हैं. इसका जिक्र निलांजन मुखोपाध्याय ने 'नरेंद्र मोदी : द मैन, द टाइम्स' में किया है.
इस पुस्तक के एक चैप्टर में मोदी कुर्ता बनाने वाले चौहान ब्रदर्स में से एक बिपिन चौहान ने कहा है कि मोदी आम तौर पर काले कपड़ों से दूर ही रहते हैं और सौ फ़ीसद काला रंग तो बिल्कुल नहीं पहनते. उनकी कलाई पर एक काला धागा ज़रूर बंधा होता है, लेकिन उसका मकसद शायद बुरी नज़र से बचाना है.
यह काला कलावा पहले मुस्लिम पीरों वगैरह के आस्तीनों पर बांधा जाता था, लेकिन अब इसका चलन पुजारियों और शनि जैसे देवताओं के मंदिरों में हो गया है. बिपिन चौहान के दावों के मुताबिक रंग-बिरंगे परिधान पहनने वाले मोदी हरे रंग से भी दूरी बरतते हैं.तिहास के नज़रिए से देखें तो शासक वर्ग काले रंग को हमेशा नापसंद करता आया है, ख़ासकर वे शासक जो सामंती, एकाधिकारवादी, तानाशाह और सत्ता के मद के साथ आनेवाले दुराग्रहों और अंधविश्वासों से संचालित से होते हैं. इनका इतिहास जानना अपने आप में कम दिलचस्प नहीं है.
बीसवीं सदी के सबसे बड़े उपन्यासकार कहे जानेवाले कोलंबियाई लेखक गैब्रियल गार्सिया मार्केज़ ने अपने कई इंटरव्यू और ख़ासकर एक दूसरे कोलम्बियाई लेखक प्लीनियो मेंदोसा से एक लम्बी बातचीत 'अमरूद की खुश्बू' में लातिन अमरीका के कई तानाशाहों की ख़ब्तों और सनकों का दिलचस्प ज़िक्र किया है.
मसलन, एक तानाशाह ने अपने देश में काली दाढ़ी रखने और दूसरे तानाशाह ने काली छतरी लेकर चलने पर पाबंदी लगा दी थी क्योंकि ज्योतिषियों ने काले रंग को उनके लिए अशुभ बताया था.
हैती के शासक फ्रांस्वा दुबलिये उर्फ़ पापा डॉक (1957-97) ने अपने देश में काले रंग के तमाम कुत्तों को मरवा दिया था. उसका अन्धविश्वास था कि उसके विरोधी नेता क्लेमे बारबो ने जादू के ज़रिये खुद को काले कुत्ते में बदल दिया है और उससे बदला लेने जा रहा है. कहते हैं, बारबो को फांसी पर चढ़ाने के बाद उसने जादू-टोने के लिए उसका सर अपने पास रख लिया.
दाढ़ी और लम्बे बालों के एक और दुश्मन तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रपति सपरमुरत नियाज़ोव (1990-2006) भी रहे जिन्होंने सोवियत संघ के टूटने-बिखरने के बाद अपने देश की सत्ता हथिया ली और कई अजीब फ़रमान जारी किए. काली दाढ़ी इसलिए उनके निशाने पर थी कि इस्लाम में जायज़ या ज़रूरी होने पर भी उससे नौजवान पीढ़ी अपनी 'अलग पहचान' बना रही थी.
नियाज़ोव ने काली कारों पर भी प्रतिबन्ध लगाया. वे कुत्तों को नापसंद करते थे और वे चाहे किसी भी रंग के हों, उन्हें अपने राज्य से बाहर खदेड़ देते थे. उसके शासन में संगीत कार्यक्रमों में होंठ हिलाकर नक़ल करने, टीवी पर मेकअप करके आने और तम्बाकू चबाने की भी मनाही थी. यही नहीं, उन्होंने एक अनोखा कैलेंडर भी चलाया जिसमें वर्ष की शुरुआत उसकी जन्मतिथि से मानी गई.रअसल काले रंग से भड़कने का समाजशास्त्र और मनोविज्ञान ख़ासा पुराना है. रोमन साम्राज्य के समय से ही उसे शोक, अशुभ, मौत, जादू-टोने और चुड़ैलों से जोड़ा जाता रहा. पश्चिमी देशों में मृतक के अंतिम संस्कार पर काले वस्त्र पहनकर आने का चलन उसी परंपरा का विस्तार है.
यह परंपरा विक्टोरियाई युग (1861) में शुरू हुई थी जहां विधवाएं दो-तीन वर्ष तक काले वस्त्र पहनने के लिए विवश थीं. sex
लेकिन अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में वह वर्ड्सवर्थ, बायरन, शेली, कीट्स, विलियम ब्लेक, कोलरिज जैसे महान रोमांटिक कवियों का सबसे प्रिय रंग बना, जो अक्सर काले कपड़ों में रहते थे. वे कवियों को राजा-रानियों से श्रेष्ठ मानते थे और लीक से हटकर चलते हुए विक्टोरियाई युग की तथाकथित नैतिकताओं के ख़िलाफ़ थे. शेली का प्रसिद्ध कथन है कि 'कवि विश्व के स्वघोषित दूत' होते हैं.
बीसवीं सदी आते-आते काले रंग का अर्थ बदल गया और उसने महंगे और ऊंचे दर्जे के फ़ैशन में प्रवेश किया. काले कपड़ों को संपन्न-सुरुचिपूर्ण रहन-सहन और परिधान का हिस्सा बनाने में फ़्रांस के फ़ैशन डिज़ाइनरों का बहुत हाथ है.सी के आसपास ब्रिटेन में बीटल गायकों और उससे कुछ पहले अमरीका की बीट पीढ़ी ने भी व्यवस्था-विरोध के प्रतीक के रूप में काले कपड़े अपनाए. काले रंग की अहमियत बढ़ने के साथ उसका विरोध भी हुआ और कहा गया कि 'पेरिस का फ़ैशन एक स्थाई अंतिम संस्कार' बन चुका है.
लेकिन बड़ी फ़ैशन कंपनियों का कहना था कि काला रंग एक साथ 'बहुत शांत, विनम्र, अखंड और रहस्यमय' है.
एक मशहूर कंपनी ईव्स सांलरा का ख़याल था, 'काला परिधान महिलाओं को पेंसिल की एक ही रेखा में परिभाषित, शैलीकृत और प्रतिष्ठित' कर देता है'. कुल मिलाकर शोक के इस रंग को फ़्रांस ने एक 'प्रसन्न रंग' में बदल दिया.
एक डिज़ाइनर का कहना था, "काला एक काव्यात्मक रंग है. आप किसी कवि की कैसी कल्पना करते हैं? चटख़ पीली जैकेट पहने हुए? शायद नहीं." काला अब इतना अधिक प्रचलन में आ गया है कि अगर सर्दियों में देखें तो पूरा यूरोप काले कपड़ों में मातम मनाता हुआ नज़र आएगा.
लेकिन विरोध और प्रतिरोध के रंग के रूप में काले की अहमियत हमेशा बनी रही है. मध्यवर्गीय उपभोक्ताकरण के इस भीषण दौर में जहां विरोध-प्रतिरोध-प्रदर्शन ख़त्म हो रहे हैं, काले झंडे जब कभी नज़र आते हैं तो एक उम्मीद बंधती है कि शायद कोई बदलाव हो रहा है या होनेवाला है.

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