Thursday, June 20, 2019

हॉन्गकॉन्ग क्या पूरी तरह से चीन का हो पाएगा

क्या उन्हें ये नहीं पूछना चाहिए था कि राज्य में जन स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत इस तरह क्यों चरमरा गई या स्वास्थ्य बजट में एकमुश्त कटौती क्यों की गई? पूछना चाहिए था, मगर नहीं पूछे क्योंकि ये सत्ताधारियों के लिए असुविधाजनक थे.
दरअसल, इस तरह के हादसों की तह तक जाने और बड़े सवाल खड़ा करने की उसकी आदत अब रही ही नहीं. वह आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा योजना की तारीफ़ में घंटों बहस करवा सकता है, मगर ये नहीं पूछता कि ऐसे मौक़ों पर उसकी क्या उपयोगिता है.
विडंबना ये देखिए कि ऐसे मौक़ों पर भी वह विपक्ष को ही निशाना बनाता है. उसी से सवाल करता है कि वह चुप क्यों है, आंदोलन, प्रदर्शन क्यों नही कर रहा. विपक्ष को जगाना भी ज़रूरी है मगर जनता की निगाहों मे गिराने की निरंतर कोशिश करना अलोकतांत्रिक.
वह सतही तौर पर इन्हें देखता है और इनका इस्तेमाल अपने मुनाफ़े के लिए करके अगले हादसे का इंतज़ार करने लगता है. अब भी वह यही करेगा. आप लिख लीजिए मुज़फ़्फ़रपुर को पूरी तरह से निचोड़ने के बाद वह इसे भूल जाएगा.
ठीक उसी तरह जैसे गोरखपुर में सैकड़ों जानें जाने पर हाय हाय मचाने के बाद अब उसे उसकी कोई याद नहीं है. यही व्यावसायिक मीडिया का चरित्र है, पत्रकारिता बिरादरी उसके हिसाब से ढल चुकी है.
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)
हॉन्गकॉन्ग की चीफ़ एग्जेक्युटिव यानी सबसे बड़ी नेता कैरी लैम लोगों से मुख़ातिब थीं.
संयत और विनम्र दिख रही कैरी लैम ने कहा, "मुझे निजी तौर पर ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर लेनी होगी. इस (प्रत्यर्पण) बिल की वजह से समाज में विवाद, टकराव और बेचैनी पैदा हुई. इसके लिए मैं हॉन्गकॉन्ग के लोगों से तहे दिल से माफ़ी मांगती हूं."
15 जून को कैरी लैम हॉन्गकॉन्ग के लोगों का ग़ुस्सा शांत करने के लिए विवादों में घिरे प्रत्यर्पण बिल को निलंबित करने का एलान कर चुकी थीं.
हॉन्गकॉन्ग में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था जब प्रशासन ने बढ़ाने के बाद क़दम पीछे खींचे हों.
चीन समर्थित सीईओ ने झुकने का संकेत दिया, फिर भी हॉन्गकॉन्ग के आम लोग समझौते के मूड में नहीं थे. रविवार (16 जून) को हॉन्गकॉन्ग में लेजिस्लेटिव काउंसिल की ओर जाने वाली सड़कों पर लोगों का हुजूम था. स्टेशन पूरी तरह जाम थे और कहीं भी तिल रखने की जगह नहीं थी.
प्रदर्शनकारी उस बिल की पूरी तरह विदाई चाहते थे जिसमें ये प्रावधान प्रस्तावित है कि हॉन्गकॉन्ग के लोगों को मुक़दमा चलाने के लिए चीन प्रत्यर्पित किया जा सकता है.
सरकार की दलील थी कि सिर्फ़ गंभीर और आपराधिक मामलों के अभियुक्तों को ही चीन भेजा जाएगा और हॉन्गकॉन्ग के एक जज की मंजूरी के बाद ही प्रत्यर्पण होगा, लेकिन लोग इस बिल को हॉन्गकॉन्ग की 'स्वायत्तता पर हमले' के तौर पर देख रहे हैं. इसे राजनीतिक विरोधियों को ठिकाने लगाने का औज़ार माना जा रहा है.
दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर अलका आचार्य उस फ़िक्र की बात करती हैं, जिसे लेकर हॉन्गकॉन्ग के लोग सड़कों पर उतरे.
अलका आचार्य कहती हैं, "लोगों की नज़र में ये है कि और कोई तरीक़ा नहीं मिला तो वो इस तरह से क़ानून बना रहे हैं. ऐसे क़ानून से हॉन्गकॉन्ग पर बीजिंग की पकड़ और मज़बूत होगी. मुझे लगता है कि एक उबाल जो धीरे-धीरे उठता है, वो इस बिल से उमड़ पड़ा."
ऐसा उबाल हॉन्गकॉन्ग ने पहले कभी नहीं देखा था. दुनिया भर का ध्यान खींचने वाले 2014 के 'अंब्रेला मूवमेंट' के दौरान भी नहीं.
आयोजकों का दावा है कि रविवार को रिकॉर्ड 20 लाख लोग विरोध प्रदर्शन के ज़रिए ये कहने आए थे कि वो प्रत्यर्पण बिल को निलंबित करने भर से ख़ुश नहीं हैं. वो चाहते हैं कि ये बिल पूरी तरह विदा हो जाए.
हॉन्गकॉन्ग पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की संख्या तीन लाख तीस हज़ार के क़रीब बताई. लेकिन तस्वीरें आयोजकों के दावों के क़रीब दिख रही थीं. लोगों का जोश हैरान करने वाला था और हैरानी की एक वजह ये थी कि बीते बुधवार को ही प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच ज़ोरदार झड़प हुई थी.
बुधवार के प्रदर्शन के दौरान आंदोलनकारी पुलिस से मुक़ाबले की तैयारी के साथ आए थे.
पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे तो प्रदर्शनकारियों ने भी जवाब दिया. वो मास्क, दस्ताने और हेलमेट पहने थे. प्रदर्शन के दौरान घायल हुए लोगों का इलाज कर रहे थे. सब कुछ संगठित तौर पर हो रहा था.
बीजिंग में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सैबल दासगुप्ता की राय है कि इस संगठित विरोध ने ही हॉन्गकॉन्ग प्रशासन और चीन को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया.
वो कहते हैं, "हॉन्गकॉन्ग में जो लेजिस्लेटिव काउंसिल है, उसमें स्वतंत्र लोगों की जगह कम्युनिस्टों को डाल दिया गया है. आज वहां कम्युनिस्ट पार्टी का बहुमत है. अगर ये बिल काउंसिल में आता तो पारित हो जाता. सिर्फ़ सड़क ने इसे रोका है."
लेकिन, हॉन्गकॉन्ग में आंदोलनकारी कोई पहली बार सड़क पर नहीं उतरे हैं. साल 2014 में ज़्यादा लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग के साथ 'ऑक्यूपाई सेंट्रल प्रोटेस्ट' हुआ था. जहां आंदोलनकारियों ने पुलिस के आंसू गैस हमले से बचने के लिए छाते थामे और इसे अंब्रेला मूवमेंट का नाम मिल गया. तब आंदोलनकारी 79 दिन तक सड़क पर थे. लेकिन सरकार नहीं झुकी.
प्रोफ़ेसर अलका आचार्य दोनों आंदोलनों के बीच का अंतर समझाते हुए कहती हैं, "अंब्रेला मूवमेंट में स्वायत्तता की बात इस तरह सामने नहीं आई लेकिन प्रत्यर्पण का मतलब ये है कि बीजिंग को हक़ रहेगा कि वो किसी भी व्यक्ति को, जिसके ख़िलाफ वो कार्रवाई करना चाहते हैं, प्रत्यर्पण का केस दायर कर चीन बुलवा सकते हैं. ये राजनीतिक स्वायत्तता पर सीधा हमला है."
हॉन्गकॉन्ग 1841 से 1997 तक ब्रिटेन की कॉलोनी था. ब्रिटेन ने उसे 'वन कंट्री टू सिस्टम' यानी एक देश और दो प्रणाली समझौते के तहत चीन को सुपुर्द किया. ये क़रार हॉन्गकॉन्ग को वो आज़ादी और लोकतांत्रिक अधिकार देता है, जो चीन के लोगों को हासिल नहीं है.

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